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शाकाहारी खुराक पर्यावरण के लिए बेहतर

एक अध्ययन में सामने आया है कि विशुद्ध शाकाहार का सेवन पशु उत्पादों की तुलना में पृथ्वी के लिए बेहतर हो सकता है। ‘फ्रंटियर्स इन न्यूट्रीशन’ नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ यह अध्ययन पहली बार दोनों आहार पद्धतियों और खेती उत्पादन प्रणालियों के पर्यावरणीय प्रभावों की पड़ताल करता है।

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पृथ्वी की सेहत के लिए अहम है शाकाहार

पाठकों को याद होगा कि मैंने देश में शाकाहारी भोजन न करने वालों का बचाव किया था। जैसा कि मैंने पहले कहा था, हमारे खाने के बारे में होने वाली चर्चा का संबंध इस बात से ज्यादा है कि हम कोई फसल कैसे उगाते हैं और कितना सेवन करते हैं। इसका संबंध भोजन (इस मामले में मांस) से नहीं है। किसानों के लिए पालतू पशु भी संपत्ति ही हैं। मेरा मानना है कि अगर हम उन पशुओं को मांस के लिए बेचने की उनकी क्षमता भी छीन लेंगे तो हम उनको और गरीब बनाएंगे। इससे उनकी अहम संपदा मूल्यहीन हो जाएगी। मैं भोजन निर्माण के बारे में चर्चा जारी रखना चाहती हूं लेकिन इस बार दूसरे पहलू पर बात के साथ।…

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पत्तल में खाओ, स्वस्थ रहो और पर्यावरण को भी स्वस्थ रखो

हमारे देश मे 2000 से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से तैयार किये जाने वाले पत्तलों और उनसे होने वाले लाभों के विषय मे पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान उपलब्ध है पर मुश्किल से पाँच प्रकार की वनस्पतियों का प्रयोग हम अपनी दिनचर्या मे करते है। आम तौर पर केले की पत्तियो मे खाना परोसा जाता है। प्राचीन ग्रंथों मे केले की पत्तियो पर परोसे गये भोजन को स्वास्थ्य के लिये लाभदायक बताया गया है। आजकल महंगे होटलों और रिसोर्ट मे भी केले की पत्तियो का यह प्रयोग होने लगा है। * पलाश के पत्तल में भोजन करने से स्वर्ण के…

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शरीर विज्ञान की दृष्टि से मांसाहारी और शाकाहारी जीवों की संरचना में मूलभूत अन्तर है 

मांसाहारी

शाकाहारी

1. दांत नुकीले तथा पंजे व नाखून तेज होते हैं। 1. दांत और नाखून चपटे होते हैं।
2.  जबड़े सिर्फ ऊपर, नीचे हिलते हैं। 2. जबड़े ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ हिलते हैं।
3. भोजन निगलते हैं। 3. भोजन चबाकर खाते हैं।
4. जीभ से चप चप कर पानी पीते हैं। 4. ओठों से पानी पीते हैं।
5. पेटों में आंतों की लंबाई छोटी होती है। 5. आंतों की लंबाई शरीर से तीन…

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अगर आप अपने ग्रह को बचाना चाहते हैं तो कृषि के जरिये दुनिया का बढने वाले तापमान से बचने के लिए अपने मांस खाने की आदतों में बदलाव लाएं और उसमें 50 प्रतिशत की कमी करें। ब्रिटेन के ‘एक्सेटर विश्वविद्यालय’ के अनुसंधानकर्ताओं ने सलाह दी है कि अगर दुनिया को जलवायु परिवर्तन से निपटना है तो उन्हें मांस खाना कम करना होगा (विशेष तौर पर गो मांस), कूड़े का ज्यादा से ज्यादा पुनर्चक्रण करना होगा, जैव ईंधन बनाने में प्रयुक्त होने वाले पौधों को उगाने के लिए कृषि भूमि का उपयोग करना होगा। एक खबर के अनुसार, अगर हम अपनी भूमि को बेहतर नहीं बना सकें तो लगातार बढ़ रही जनसंख्या को खिलाना मुश्किल हो जाएगा और वह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगा जो कार्बनहाइऑक्साइड से ज्यादा घातक होगा।

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