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pragya-maharaj

1983 तक डॉ. प्रो. पूर्णसिंह लोकेश जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर पदस्थ थे। सैकड़ों विद्यार्थियों को हिंदी की तालीम देने के बाद अचानक उनका मन दुनिया की चकाचौंध से उचटा और वे संन्यासी हो गए। अब वे हजारों लोगों को मांसाहारी से शाकाहारी बनाने व धर्म से जोडऩे के मिशन में जुटे हैं।

हम बात कर रहे हैं जबलपुर मूल के स्वामी प्रज्ञानंद महाराज की। वे आवाहन अखाड़े के महामंडलेश्वर हैं और भूखी माता क्षेत्र में सिंहस्थ कैंप में ठहरे हैं। सिंहस्थ में यूं तो कई उच्च शिक्षित या ऊंचे ओहदों को छोड़कर वैराग्य ग्रहण करने वाले संत हैं, लेकिन इनमें भी प्रज्ञानंदजी महाराज कुछ जुदा हैं। 71 वर्ष की आयु में भी वे बिल्कुल फिट हैं। ना कोई रोग और ना चलने-सुनने में कोई दिक्कत। लाखों रुपए साल की कमाई छोड़ अब वे केवल धर्म-संस्कृति को बचाए रखने व इस क्षेत्र में शिक्षितों को लाने के लिए काम कर रहे हैं।
एक ही ध्येय- सभी बनें शाकाहारी
65 देशों की यात्रा में प्रज्ञानंद महाराज हजारों अप्रवासी भारतीयों व विदेशी मूल के लोगों को शाकाहारी बना चुके हैं। उनके अनुसार मेरा ध्येय यही है कि सभी शाकाहारी बनें। अब तक 80 हजार लोग उनसे शाहाकार का संकल्प ले चुके हैं। बकौल महाराज, ये दक्षिणा मुझे सबसे प्रिय है। जिस दिन भी कोई यह संकल्प करे, मुझे लगता है ईश्वर से साक्षात्कार हो गया है।
5 साल आयु, ध्रुव बनने भागे घर से
प्रज्ञानंद जब 5 साल के थे तो रक्षाबंधन वाले दिन घर से कहीं निकल गए थे। वे ध्रुव बनना चाहते थे, युवावस्था में भी उन्होंने साधु बनने की कोशिश की, लेकिन तब परिजन ने रोक दिया। एमए, एलएलबी व पीएचडी करने के बाद भी यह निश्चय कायम रहा। कुछ साल की नौकरी के बाद उन्होंने आखिरकार वैराग्य ले ही लिया।
साउथ अमेरिका में रेडियो पर गायत्री मंत्र
प्रज्ञानंद महाराज कहते हैं कि उन्होंने कई विदेशियों को गायत्री मंत्र सिखाया। आज भी साउथ अमेरिका के सूरीनाम के रेडियो स्टेशन संगीतमाला पर दिन में 24 बार उनकी आवाज में गायत्री मंत्र प्रसारित होता है। उनके शिष्य ने ये रिकॉर्डिंग कराई थी। वे अब तक 65 देशों की यात्रा कर चुके हैं।
शिकागो में श्रीकृष्ण की प्रतिष्ठा
वचन व कर्म के पक्के हैं प्रज्ञानंद महाराज। शिकागो में श्रीकृष्ण भगवान की प्रतिष्ठा का अवसर उन्हें मिला। वहां अप्रवासी भी मांसाहारी थे, तब उन्हें मालूम हुआ तो प्रतिष्ठा से इनकार कर दिया। लोगों ने 1 लाख डॉलर देने का ऑफर किया, लेकिन उन्होंने मांसाहारी व्यक्ति से ये पुनीत काम नहीं कराया। फिर वहां एक ऐसा परिवार मिला, जो शाकाहारी था। उसके हाथों प्रतिष्ठा कराई। वे बोले, मैं श्रद्धा और विश्वास का सौदा नहीं करता, चाहे मुझे प्राण क्यों ना त्यागना पड़े।

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