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अफ्रीकी देश जांबिया के लिविंगस्टन शहर में पिछले महीने हुए 'विश्व दलहन महाधिवेशन में दालों को गरीब जनता के मीट की संज्ञा दी गई है। विश्व के 30 देशों के 500 से अधिक वैज्ञानिकों ने कहा कि विश्व की अधिकांश जनता प्रोटीन युक्त आहार मांसाहार का सेवन नहीं कर पाती है। उनके लिए दाल ही मीट है।

डी कुमार ने किया प्रतिनिधित्व

इस महाधिवेशन में जोधपुर का प्रतिनिधित्व केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के पूर्व दलहन वैज्ञानिक डॉ. डी कुमार ने किया। डॉ. कुमार ने बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, नागौर और बीकानेर में बहुतायात में होने वाली मूंग-मोठ की दालों की विभिन्न किस्मों के बारे में बताया।

दलहन वर्ष घोषित

अफ्रीका भी गर्म मरुस्थल में आता है और थार के दालों की कई किस्में वहां भी उगाई जा सकती हैं। इसी तरह अफ्रीकी चंवला, बीन व सोयाबीन की उन्नत किस्मों का यहां उत्पादन कर जनता की प्रोटीन आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र की ओर से वर्ष 2016 को दलहन वर्ष घोषित किया गया है।

मीट में 40 तो सोयाबीन में 36 फीसदी है प्रोटीन

शरीर के विभिन्न अंगों की मरम्मत, नए अंगों, ऊतकों व कोशिकाओं के निर्माण में प्रोटीन आवश्यक होता है जो सर्वाधिक मांसाहार में 40 फीसदी तक पाया जाता है। शाकाहारी लोगों के लिए केवल दाल ही मांसाहार का मुकाबला कर सकती है। दालों में 20 से लेकर 36 फीसदी तक प्रोटीन होता है जो अन्य किसी स्त्रोत में नहीं पाया जाता।

सोयाबीन में 36 फीसदी प्रोटीन

सर्वाधिक प्रोटीन सोयाबीन में 36 फीसदी तक होता है इसलिए सोयाबीन को वानस्पतिक मीट भी कहते हैं। इसके लिए दालों में फाइबर, ओमेगा एसिड व कई खनिज पदार्थ भी होते हैं।

कौनसी दाल में कितना प्रोटीन

दाल प्रोटीन (ग्राम में)
चंवला 22
बीन 27
सोयाबीन 36
मूंग 24
कुल्थी 30
मोठ 24
चना 25
उड़द 24
तूअर 23
काला चना 13
(प्रति 100 ग्राम में उपलब्धता)

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