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पौधे और जंतुओं में जो सम्बंध सबसे स्पष्ट रूप से नजर आता है वह है चराई। इसे शाकाहार भी कहते हैं। जंतुओं और पेड़-पौधों में यह सबसे महत्वपूर्ण अंतर्सम्बंध है। चराई को पारंपरिक तौर पर जंतुओं के फायदे और पौधों के नुकसान के रूप में देखा जाता है। शाकाहार वस्तुत: एक विशेष प्रकार का शिकार ही है। इस लिहाज से गाय, बकरी की तरह हम भी पौधों के शिकारी ही हैं। जंतुओं और पौधों के इस अंतर्सम्बंध में सबसे खास बात यह है कि वे अपने शिकारी से दूर भागकर बच नहीं सकते।

वे तो अपनी जगह खड़े रहकर ही शिकारी से बचने के कुछ चतुर उपाय अपनाते हैं। तरह-तरह के ऐसे उपायों को ही हम अनुकूलन कहते हैंै।

पौधों में चराई-कुतराई से अपने आप को बचाने के लिए कई तरह के उपाय विकसित हुए हैं। और यह सब एक दूसरे को अपने कौशल से पराजित कर देने का ही खेल है - एक ऐसा जीवंत खेल जिसमें शिकार और शिकारी दोनों अपने-अपने पैंतरे बदलते रहते हैं।

इसके परिणामस्वरूप दोनों में जो परिवर्तन होते हैं वह सह-विकास कहलाता है। नतीजतन कुछ पौधे और जंतु कालांतर में एक दूजे के लिए बन जाते हैं - जैसे अंजीर और ब्लास्टोफेगा कीट। कुछ अन्य प्रकरणों में कभी शिकारी चतुर नजर आता है तो कभी शिकार।

परंतु आज चर्चा का विषय यह है कि पौधे अपने आप को चराई से कैसे बचाते है? कुछ पौधे भौतिक तरीकों (जैसे कांटों) की मदद से ऐसा कर पाते हैं तो कुछ रासायनिक तरीके अपनाते हैं। ये दूसरे प्रकार के पौधे ऐसे रसायन उत्पन्न करते हैं जो शाकाहारियों के स्वाद को बिगाड़ देते हैं या उनके लिए विषैले होते हैं।

इन्हें द्वितीयक चयापचयी पदार्थ कहते हैं। जैसे टैनिन, अल्केलॉइड्स और ग्लायकोसाइड्स। दालचीनी और लौंग में पाया जाने वाला विशेष पदार्थ फिनाइल प्रोपेन, पेपरङ्क्षमट एवं केटनिप जैसे टरपींस, दर्द निवारक एवं शामक दवाओं के घटक मॉर्फीन तथा कैफीन द्वितीयक चयापचयी पदार्थ ही हैं।

जिन पौधों में ऐसे पदार्थ बहुतायत में पाए जाते हैं, शाकाहारी उनसे दूर ही रहते हैं। द्वितीयक चयापचयी पदार्थों की उत्पत्ति के सम्बंध में दो मत दिए गए है।

पहला मत मुलर ने 1970 में दिया था। उनके मतानुसार ये व्यर्थ पदार्थ हैं। हम जानते हैं कि उत्सर्जन चयापचय का एक आवश्यक हिस्सा है और पौधों में यह कार्य जंतुओं की अपेक्षा थोड़े अलग तरीकों से होता है। पौधे जंतुओं की तरह व्यर्थ पदार्थों का त्याग मल-मूत्र के रूप में नहीं करते क्योंकि उनमें उत्सर्जन तंत्र नहीं पाया जाता।

मुलर के मतानुसार ऐसे व्यर्थ पदार्थों से निजात पाने के लिए कई तरीके विकसित हुए हैं। जैसे कार्बनिक पदार्थों को वाष्पशील पदार्थों के रूप में त्यागना। एक तरीका यह है कि इनजहरीले व्यर्थ पदार्थों को कम हानिकारक पदार्थों में बदलकर अपने शरीर के कुछ हिस्सों मेंजमा करके रखना। ऐसा करके पौधे इन व्यर्थ पदार्थों का उपयोग अपने फायदे के लिए कई तरीकों से कर सकते हैं।

जैसे वे इन व्यर्थ पदार्थों को अपने आसपास के पर्यावरण में छोड़ सकते हैं। इस तरह से वे अपने प्रतिस्पर्धी पौधों की वृद्धि को रोकने में समर्थ हो पाते हैं। इन हानिकारक व्यर्थ पदार्थों के अन्य पौधों पर होने वाले ऐसे प्रभाव को एलीलोपैथिक प्रभाव कहते हैं।

एक अन्य तरीके में इन पदार्थों को पत्तियों एवं तनों मेंजमा करके रख लिया जाता है। इससे वे शाकाहारियों के लिए बेस्वाद याजहरीले हो जाते हैं। अत: शाकाहारी इनसे दूर ही रहते हैं। द्वितीयक चयापचयी पदार्थों के बारे में दूसरा मत एरलिच और रेवन ने 1964 में दिया था। इनका मानना है है कि ये द्वितीयक पदार्थ जानबूझ कर बनाए जाते हैं शाकाहारियों को स्वयं से दूर रखने के लिए।

इस मत के अनुसार कुछ द्वितीयक चयापचयी पदार्थ उत्सर्जी पदार्थों के रूप में पौधे की आवश्यकता होते हैं ङ्क्षकतु ऐसे सारे पदार्थ सक्रिय रूप से चयापचय की कीमत पर पौधों द्वारा बनाए जाते हैं।

यदि पौधे द्वितीयक चयापचयी पदार्थ बनाते हैं और उनमें इस तरह की रायासनिक विविधता होती है तो इसका असर प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया में दिखना चाहिए। इस मत का निष्कर्ष यह निकलता है कि यदि परिवेश में से सारे जंतुओं को हटा दिया जाए तो पौधों द्वारा द्वितीयक चयापचयी पदार्थ नहीं बनाए जाने चाहिए।

पादप सुरक्षा के अनुसंधानकर्ताओं का मत है कि शाकाहारियों का पौधों की फिटनेस (यानी अधिक से अधिक संतानें पैदा करने की क्षमता) पर असर पड़ता है। यदि पौधों के सुरक्षा सम्बंधी गुण एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में जा सकते हैं (यानी वे आनुवंशिक हैं) तो प्राकृतिक चयन को काम करने के लिएजरूरी कच्चा माल उपलब्ध है।

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