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पिताजी रेलवे में थे। हर दो-तीन साल में उनका ट्रांसफर होता रहता था। रेलवे की तरफ से पिताजी को सामान के लिए दो मालगाड़ी के डिब्बे मिलते थे-एक सामान के लिए और एक पालतू जानवरों के लिए। दरअसल, अंग्रेजों को यह बात मालूम थी कि जो लोग नौकरी कर रहे हैं, वे गांवों से निकले हैं इसलिए वे अपने साथ गांवों में रचने-बसने वाली आदतें भी ला रहे हैं।

इनमें जानवर पालना प्रमुख आदत थी, जिससे कि घर का घी-दूध, मक्खन, दही, छाछ सब मिल सके। सचमुच घर में जानवरों की पूरी फौज थी, गायें, बकरियां, भैंस, कुत्ते...। दूध, दही, छाछ का लेन-देन पूरे मोहल्ले में चलता था और गाय और कुत्ते की रोटी भी पूरे मोहल्ले से आती थी।

आजकल बछिया और गायों को देखकर आंखें फेर लेनी पड़ती है। क्या पता कोई गाय या उसका बछड़ा बीमार हो, मेरे छूते, प्यार करते ही जमीन पर गिर पड़े और मेरी शामत आ जाए। आजकल तो बहुत से लोग फेसबुक पर अपने काम के बारे में लिखने लगे हैं-गौरक्षक।

क्या पता इधर बछड़ा गिरे, उधर कोई फोटो खींचकर वायरल कर दे या कोई स्वनियुक्त गौरक्षक बछड़े को गिरते देख, अपने साथियों समेत लाठी-बल्लम लेकर मेरी तरफ दौड़ा आए। बेकार में मेरे हाथ-पांव टूटेंगे या जान जाएगी। कहूंगी भी तो कौन मानेगा कि मैं तो गाय या उसके बछड़े को प्यार कर रही थी। बेचारी गायों को यह पता भी नहीं होगा कि अब लोग उन्हें देखते ही रोटी खिलाना तो दूर उनसे आंखें फेरने लगे हैं।

कई दिन पहले गांव से एक रिश्तेदार का फोन आया था। वह कह रहे थे कि अब उनकी आयु हो गई है। घर में गाय और उसके कई बछड़े-बछिया हैं। पहले तो लोग मांगते रहते थे कि तुम्हारी गाय बहुत दूध देती है। अच्छी नस्ल है। इसकी एक बछिया हमें दे दो। अब कई दिन से उनसे कह रहे हैं, मगर लोग तैयार ही नहीं। एक तरह से गाय की रक्षा के नाम पर कुछ ऐसा हो गया है कि लोग गाय का नाम सुनकर ही दूर भागने लगे हैं। एक तरफ अपने देश में वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करने में लगे हैं, जहां गायें अब बछड़ों को जन्म ही नहीं देंगी, क्योंकि बछड़े अब खेती किसानी के काम नहीं आते।

उनकी जगह ट्रैक्टर ने ले ली है। आपको याद होगा कि एक समय कांग्रेस पार्टी का चुनावचिह्न दो बैलों की जोड़ी थी। जो हमारे देश के कृषि जीवन और उसमें बैल के महत्व को बताती थी मगर तकनीक ने बेचारे बैलों को खेतों से अपदस्थ कर दिया। पिछले कुछ दिनों से ऐसा हो गया है कि आप अपने ही घर के गाय-बैल को आसानी से अब किसी को बेचना तो दूर उपहार में भी नहीं दे सकते।

कौन इस बात का प्रमाणपत्र लाए कि यह बछिया, गाय, बैल, भैंस या ऊंट काटने के लिए नहीं ले जाया जा रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो यह डर लगने लगा है कि लोग गाय, बैल को पालना ही बंद कर देंगे। वैसे भी शहरी जीवन से तो ये पशु पहले ही गायब हो चुके हैं, गांव में बचे थे, यदि इसी तरह की मारपीट और तथाकथित गौरक्षकों की हिंसा चलती रही, तो वह दिन दूर नहीं कि गांवों से भी ये पशु गायब हो जाएंगे। कोई इन्हें पालना नहीं चाहेगा, बल्कि होने तो यह लगेगा कि पशुओं की रक्षा के नाम पर लोग दूसरों के दुधारू पशु छीनने लगेंगे। देश भर में पशुओं की खरीद-फरोख्त के लिए लगने वाले मेलों का क्या होगा? यह कहना कि पशुओं को काटा न जाए, सचाई से परे है।

देश में बड़ी संख्या में लोग मांसाहारी हैं। चाहे वे पहाड़ के हों, तटीय क्षेत्रों के हों, पूर्वोत्तर के हों, वे सब किसी न किसी जानवर का मांस खाते हैं। ऐसे में किसी के खानपान पर कानूनी पाबंदी कैसे लगाई जा सकती हैं? सच तो यह है कि अगर पूरा देश शाकाहारी हो जाए तो देश में खाने के लाले पड़ जाएं, क्योंकि न इतना अन्न है, न शाक-भाजी, न दूध-दही कि सबके शाकाहारी होने पर उनक पेट भरा जा सके।

कोई अपनी मर्जी से शाकाहारी होना चाहता है, वह अलग बात है। वैसे भी दुनिया में इन दिनों शाकाहार की लहर है, लेकिन यह लहर किसी कानून से नहीं, लोगों की अपनी रुचि से पैदा हुई है। किसी ने इसे थोपा नहीं है। कानून ऐसे बनें जो जानवरों से प्यार करना सिखाएं न कि कानून ऐसे हों कि जानवर का नाम सुनते ही लोग दूर भागने लगें।

-क्षमा शर्मा

(Navodaya Times)

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