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लेखक: भारत डोगरा

इन दिनों दुनिया भर में शाकाहार का चलन बढ़ रहा है। जिन समाजों में मांसाहार का प्रचलन अधिक रहा है, वहां भी बहुत से लोग नॉनवेज छोड़कर वेजिटेरियन खानपान अपना रहे हैं। कई देशों में शाकाहारिता ने एक व्यापक अभियान का रूप ले लिया है। इससे जुड़े लोग बहुत निष्ठा से बाकायदा एक विचारधारा की तरह इसका प्रचार-प्रसार करते हैं। हमारे देश में तो ऐसे अभियान की सफलता की संभावना और भी अधिक है, पर दुर्भाग्यवश हाल के समय में इसने विकृत रूप ले लिया है।

भारत के शाकाहारिता अभियान में कुछ सांप्रदायिक और संकीर्ण कट्टरवादी तत्व घुस आए हैं जो मांसाहार का विरोध धार्मिक कट्टरता के आधार पर कर रहे हैं। जहां-तहां उन्होंने इसके लिए हिंसक हमले किए हैं। भविष्य में और हिंसा करने की धमकी भी दे डाली है। दरअसल, शाकाहार का प्रचार इनका मकसद नहीं है। इसकी आड़ में वे अपने सियासी हित साधना चाहते हैं। हिंसक सोच शाकाहारिता की मूल सोच के विपरीत है। इसलिए इसके प्रचार-प्रसार में किसी पर हमला करने वालों के लिए कोई स्थान नहीं है।

विश्व स्तर पर शाकाहारी आंदोलन की मजबूती का मूल कारण यह है कि पशु-पक्षियों के प्रति करुणा रखने वाले लोगों में वृद्धि हुई है। पढ़े-लिखे सभ्य समाजों में लोगों ने अपने अध्ययन के आधार पर यह जानकारी प्राप्त की कि पिछले कुछ सौ वर्षों के इतिहास में मनुष्य ने अन्य जीव-जंतुओं के साथ कितना अन्याय किया है। अरबों पशु-पक्षियों के प्रति इतनी क्रूरता बरती गई है कि उनकी न जाने कितनी प्रजातियां लुप्त हो गई हैं या खतरे में हैं। इस जानकारी से पशु-पक्षियों के अधिकारों के आंदोलन (एनिमल राइट्स) का विस्तार हुआ।

एनिमल राइट्स आंदोलन ने सभी स्तरों पर पशु-पक्षियों से होने वाले अन्याय और अत्याचार का विरोध किया है। अब यह एक मजबूत विचार बन चुका है कि धरती केवल मनुष्य की नहीं, सभी जीव-जंतुओं की है। हर किसी को धरती पर जीने का अधिकार है। कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि उनसे होने वाली क्रूरता कम की जाए। सच्चाई यह है कि मांस के लिए पशु-पक्षियों को बहुत कष्टदायक परिस्थितियों में रखा जाता है। इस क्रूरता को कम करने के लिए एक ओर तो कई तरह के सुझाव दिए गए, दूसरी ओर बहुत से लोगों ने मांसाहार छोड़ने का निर्णय लिया।

इंसान की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए भी यह माना गया कि यदि इनमें से अधिकतर मांसाहार करते रहे तो बहुत बड़ी संख्या में पशुओं को मारना पड़ेगा। खास तौर पर कुछ साल पहले खाद्यान्न और ईंधन संकट के दौर में यह पाया गया कि मांसाहार के लिए पाले जाने वाले जानवरों, खासकर अमेरिका और चीन के गाय, सुअर और मुर्गा फार्मों में अनाज की खपत बहुत ज्यादा बढ़ गई है। विश्व स्तर पर जिन पशुओं से मांस प्राप्त किया जाता है, उन्हें जल्दी बड़ा और मोटा करने के लिए बड़ी मात्रा में अनाज खिलाया जाता है। जहां उन्हें हरा चारा खिलाया जाता है, वहां भी कृषि योग्य भूमि को अनाज उत्पादन के बजाय चारा उत्पादन में व्यस्त रखना पड़ता है।

एक मोटे आंकलन के अनुसार एक किलो मांस हासिल करने के लिए पांच किलो अनाज पशुओं को पहले खिलाना पड़ता है। इस आधार पर कुछ अर्थशास्त्री इस नतीजे पर पहुंचे कि यदि मीट की खपत बहुत तेजी से बढ़ेगी तो अगले दो-ढाई वर्षों में धरती इसके लिए जरूरी अनाज का उत्पादन नहीं कर पाएगी। खाद्यान्नों की बेतहाशा महंगाई के चलते हर जगह रसोई का खर्चा बहुत बढ़ जाएगा। जाहिर है, नॉन वेजिटेरियन के बजाय वेजिटेरियन खाने पर जोर पूरी दुनिया के हित में है।

बहस आगे बढ़ी तो यह बात भी सामने आई कि वेजिटेरियन खाने से हृदय रोग और कैंसर का खतरा कम किया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल में कुछ खास किस्म के मांस खाने से कैंसर बढ़ने की आशंका वाली रिपोर्ट जारी की है। इस तरह कई सोच के मिल जाने के कारण शाकाहारिता का अभियान विश्व स्तर पर मजबूत हुआ और दिनोंदिन लोकप्रिय होता जा रहा है। वैसे, सभी जीव-जंतुओं के प्रति करुणा व अहिंसा की सोच इसके मूल में है, इसलिए जो संकीर्ण तत्व शाकाहारिता के प्रसार के लिए हिंसा का उपयोग कर रहे हैं, वे असल में इसकी मूल भावना का उल्लंघन कर रहे हैं। इस तरह की सोच रखने वाले व्यक्ति व संगठन शाकाहारिता आंदोलन के प्रचार-प्रसार में बहुत बड़ी बाधा बनेंगे, क्योंकि ये इसके नैतिक आधार को ही नष्ट कर रहे हैं।

शाकाहारिता आंदोलन के मूल चरित्र को बनाए रखने के लिए इसका प्रचार-प्रसार धार्मिक मान्यताओं के आधार पर न होकर तर्क के आधार पर होना चाहिए। शाकाहारी लोग अपने विचार दूसरों को बताएं और दूसरों की दलील भी सुनने को तैयार रहें। सभी लोकतांत्रिक विचारधाराओं की तरह शाकाहारिता की विचारधारा को भी यह मानकर चलना होगा कि बहुत से लोगों की राय अलग हो सकती है और उन्हें अपने विचारों के मुताबिक जीने का पूरा अधिकार है। हर व्यक्ति को अपनी इच्छा से कुछ भी खाने-पीने का हक है। इस मामले में किसी से जोर-जबरदस्ती का सवाल ही नहीं उठता। हां, हम किसी को समझा-बुझा सकते हैं। उसे जानकारी दे सकते हैं। शाकाहारिता का प्रचार-प्रसार लोकतांत्रिक तौर-तरीकों और धर्म-निरपेक्षता के आधार पर होना चाहिए। इसमें कट्टरवादी सोच के लिए कोई जगह नहीं है।

एनबीटी ब्लॉग से साभार...

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